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लडका होगा? पता न लगे | कलेक्टर ने अपने दफ्तर से जोडा सभी सोनोग्राफी माशिनो को - (दैनिक भास्कर)
27 November 2011

उपमिता वाजपेयी. कोल्हापुर से

कोल्हापुर। देश के दूसरे दर्जे के जिलों में सबसे ज्यादा प्रतिव्यक्ति औसत आय (16,155 रु.) यहीं की है। एक जिले में सबसे ज्यादा मर्सिडीज कारें यहीं पर हैं। लेकिन खुशहाली के इन प्रतीकों पर धब्बा लगाती एक सच्चाई। कोल्हापुर देश के उन जिलों में से एक, जहां लड़कियों की आबादी का अनुपात सबसे बदतर। वजह वही। लिंग परीक्षण और फिर कन्या भ्रूण हत्या। अब यह तस्वीर बदल रही है। लेकिन काफी जद्दोजहद के बाद।

कोल्हापुर में प्रति 1000 लड़कों पर 839 लड़कियां। पन्हाला तहसील में 1000 पुरुषों पर सिर्फ 740 महिलाएं। कोल्हापुर शहर में 250 सोनोग्राफी मशीन। कलेक्टर लक्ष्मीकांत देशमुख ने की कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाने की पहल। इसके पीछे काम कर रहे लोगों को पकडऩा और बिना सबूत उन पर केस करना मुश्किल था। उन्होंने सोनोग्राफी सेंटरों से अगस्त 2009 में ऑनलाइन फॉर्म भरने को कहा, ताकि लिंग परीक्षण को रोका जा सके।

अभी तक स्वास्थ्य विभाग केवल छापे मारकर सोनोग्राफी सेंटर सील करता था। बिना रजिस्ट्रेशन वाली मशीन जब्त कर ली जाती थी। लिंग परीक्षण करते रंगे हाथ पकडऩा काफी मुश्किल होता था। ऑनलाइन फॉर्म से भी जब हालात नहीं सुधरे। तब देशमुख ने सोनाग्राफी मशीनों पर निगरानी के लिए तकनीक का सहारा लेने की ठानी।

देशमुख कहते हैं कि वे ट्रांसपेरेंसी के लिए तकनीक पर ज्यादा भरोसा करते हैं। कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए भी तकनीक का सहारा लिया। उन्होंने अपने दफ्तर में एक सर्वर लगाकर सभी सोनोग्राफी मशीनों को उससे जोड़ दिया। सर्वर को नाम दिया सायलेंट ऑबजर्वर। इसे बनाया पुणे की आईटी कंपनी मैगनम ऑपस ने।

अब लिंग परीक्षण कर रहे सेंटर को पकडऩा और सबूत के साथ केस करना आसान था। 8 मार्च 2010 से वर्कशॉप के जरिए गायनेकोलॉजिस्ट और रेडियोलॉजिस्ट (सोनोग्राफी सेंटर के मालिकों) को ‘सायलेंट ऑबजर्वर’ को लेकर प्रोत्साहित किया जाने लगा। 15 अगस्त 20१० को पहली मशीन लगी जिला रेडियोलॉजी एसोसिएशन के प्रेसिडेंट डॉ. सुनील कुबेर के सोनोग्राफी सेंटर पर। इन्हें प्रोजेक्ट का एम्बेसेडर भी बनाया गया।

ऐसे जीती कानूनी लड़ाई

कलेक्टर की इस मुहिम से परेशान सोनोग्राफी सेंटरों के मालिक मानने वाले नहीं थे। उन्होंने इसे अदालत में चुनौती दी। कुछ मरीजों के रिश्तेदारों के साथ मिलकर उन्होंने हाईकोर्ट में दावा किया कि इससे मरीज की निजता के अधिकार का उल्लंघन हो रहा है। लंबी अदालती कार्रवाई के बाद कोर्ट ने कलेक्टर के हक में फैसला दिया। उसका कहना था कि जीने का अधिकार (राइट टु लाइफ) निजता के अधिकार (राइट टु प्राइवेसी) से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।

सुधरा है महिला-पुरुष अनुपात

प्रशासन के इस कदम के अब परिणाम दिखने भी शुरू हो गए हैं। जिले में 2001 की जनगणना के अनुसार एक हजार पुरुषों पर 839 महिलाएं थीं, 2011 में यह बढ़कर 845 हो गई हैं। माना जा रहा है कि यह बदलाव दो साल पहले शुरू किए गए साइलेंट ऑब्जर्वर प्रोजेक्ट का असर है। जो एक्टिव ट्रैकर लगाने से 40 हजार हो गया। हालांकि कंपनी अब इसे 19 हजार रुपए में सप्लाय कर रही है। उसका इरादा इसकी लागत और कम करने का है।

‘बेवजह पहरेदारी लग रही थी’ सायलेंट ऑबजर्वर को डॉक्टर थोपा गया नियम और बेवजह की पहरेदारी मान रहे थे। जो डॉक्टर लिंग परीक्षण नहीं करते वे भी इसे लगाने को लेकर असहज थे। जो लिंग परीक्षण और गैरकानूनी काम करते थे, वे यूनिट से छेड़छाड़ करने लगे। यूनिट लगवाने पर 30-40 हजार खर्च था। डॉक्टर इसके लिए भी तैयार नहीं थे। हालांकि बाद में प्रशासन की ओर से इसका आधा खर्च दिया जाने लगा।
- डॉ. सुनील कुबेर, प्रेसिडेंट, रेडियोलॉजी एसोसिएशन
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‘तंगी के बावजूद पूरा किया प्रोजेक्ट’

मैं और मेरी टीम सायलेंट ऑबजर्वर प्रोजेक्ट से भावनात्मक रूप से जुड़ी
थी |सरकारी प्रोजेक्ट था इसलिए फंड और बजट की समस्या थी। हमें डेढ़ साल तक कोई पैसा नहीं मिला। कई बार तो जेब से सैलरी देना पड़ी। मेडिकल टर्मिनोलॉजी और कानूनी पेंच को समझते हुए काम करना सबसे बड़ी चुनौती थी|सोनोग्राफी मशीन के चालू होते ही साइलेंट ऑबजर्वर चालू हो, इसके लिए हमें काफी मशक्कत करनी पड़ी।
- गिरीश लाड़, मैनेजिंग डायरेक्टर, मैगनम ऑपस

‘एक जगह बैठकर रखी जा सकती है जिले पर नजर’ सायलेंट ऑबजर्वर के जरिए एक जगह बैठकर पूरे जिले की जानकारी यहां तक कि मरीज के बारे में हर छोटी बात पता कर सकते हैं। इसमें यह जानकारी भी शामिल है कि मरीज के पहले कितने बच्चे हैं और उनमें कितनी लड़कियां है। इससे गर्भपात करवाए जाने की संभवाना पता की जा सकती है। और उसे रोका भी जा सकता है।
- डॉ. मुकुंद सादिगले, मेडिकल ऑफिसर, नोडल ऑफिसर पीएनडीटी